विश्वास

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करूं या ना करूं? जाऊं या ना जाऊं? सही है या गलत है? प्रश्न जो हर पल आपको घेरे रहते है और सोचने को मजबूर करते है। डर है की कहीं गलत कदम ना उठा ले और कोई आपसे खेल ना जाए। डर लगता है कही अकेले जाने से क्योंकि विश्वास नहीं किसी पे। सोचना पड़ता है किसी को कुछ बताने से पहले क्योंकि विश्वास नहीं किसी पे। झिझक होती है मदद मांगने में क्योंकि विश्वास नहीं किसी पे। आखिर ऐसा क्या है विश्वास में? क्यों लगता है डर किसी पे विश्वास करने से?

 आज एक ऐसा समय है जहां विश्वास ही एक सबसे बड़ा मध्यम है धोखा देने का। आज किसी पे विश्वास करना यानी खुद को धोखा देने का दरवाज़ा खोलना। इंतजार करते है लोग इस समय का जब कोई उनपे विश्वास करे और फिर मौका मिलते ही उसे नीचा दिखाना। इंतजार करते है उस समय का जब वो फायदा उठा सके।

ललच और दुश्मनी जन्म देती है विश्वासघात को। यदि दिल में लालच का छोटा सा भी किनारा आ गया तो वो समय के साथ- साथ उभरता चला जाता है और एक समय आएगा जब वो मजबूर हो जायेगा गलत करने को। मजबूर हो जायेगा वो करने को, जो दूसरों को चोट पहुंचेगा पर खुद को संतुष्टि देगा। परंतु ये सुकून लंबे समय तक नही रहता। समय के साथ-साथ नए और भी बड़े लालच उत्तपन्न होंगे जो और गलती करने को मजबूर करेंगे। मजबूर करेंगे अपनों के सत्य विश्वासघात करने को। मजबूर करेंगे और बड़े कदम उठाने को और एक समय आएगा जब ये मजबूरी से आदत बन जायेगी। ये आदत नई नकारात्मक ऊर्जा उत्तपान्न करेगी।

जीवन एक ऐसा दौर है जिसमे चीज सहजतापूर्वक नही होती हैं। इस दौर में लाखों लोग आएंगे और चले जायेंगे। कितने तुम्हें तुम्हारे लिए आएंगे और कितने बस अपने मतलब के लिए। खुद की सोच को पहचानने के सक्षम बनाना पड़ेगा वरना फस जाओगे उस दलदल में जहां से निकलना आसान नहीं। फस जाओगे वहां, जहां लोग बैठे होगे तुम्हारे इंतजार में तुम्हारा फायदा उठाने को। भागते रहते है लोग जीवन में आगे बढ़ने के लिए और भूल जाते है की आगे बढ़ना किसके साथ था। कुछ तो अच्छों को छोड़ बुरों को चुनते है और कुछ जरूरत को छोड़ बरबादी को चुनते है। कुछ विश्वास को छोड़ विश्वासघात को चुनते है।

जीना है तो खुद पे विश्वास करना सीखो। मत भागो उसके पीछे जो तुम्हारे विश्वास लायक नहीं। मत भागो उस भीड़ में जिसमे लोग आपको भगाना चाहते हैं। पर भागों उस रास्ते पे जिसपे आप, आप रहो और खुद को बदलना ना पड़ें। विश्वास करो उसपे जो उस लायक हो। पर मत करना इतना विश्वास की विश्वासघात होने के बाद उम्मीद ही टूट जाए। आखें नहीं अब दिमाग से देखने का समय है। तो बढ़ते चलो, समझते चलो और सीखते रहो।

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